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सभी दवाइयाँ सभी लोगों पर एक जैसा असर क्यों नहीं करतीं हिंदी में जानकारी

दवाइयाँ सभी लोगों पर एक जैसा असर क्यों नहीं करतीं


अक्सर आपने पाया होगा कि एक दवा किसी व्यक्ति पर अच्छा असर करती है, जबकि वही दवा किसी दूसरे व्यक्ति पर उतना अच्छा असर नहीं करती। इसका कारण विज्ञान के अनुसार यह हो सकता है कि यह जीन, वंश या व्यक्ति के रहन-सहन पर निर्भर करता है।
Why don't all medicines affect everyone the same way
Why don't all medicines affect everyone the same way?



दवा का असर किन-किन चीजों पर निर्भर करता है, इसे समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि हमारे शरीर का आकार क्या है, हमने हाल ही में क्या खाना खाया है और हम कौन-सी अन्य दवाएँ ले रहे हैं। लेकिन सबसे ज्यादा असर हमारे जीन (Genes) पर निर्भर करता है, जो यह तय करते हैं कि हमारा शरीर दवा के प्रति कितना संवेदनशील है।

कई बार दवा इस बात पर भी निर्भर करती है कि आपका मेटाबॉलिज्म (Metabolism) यानी पाचन तंत्र ठीक से काम कर रहा है या नहीं। इसलिए कई अध्ययन उन आनुवंशिक विविधताओं (Genetic Variants) की खोज पर केंद्रित होते हैं, जो दवा के मेटाबोलिज्म से जुड़ी होती हैं। इस शोध क्षेत्र को Pharmacogenomics (फार्माकोजीनोमिक्स) कहा जाता है।

 वंश (Ancestry) की भूमिका कितनी होती है 


कोई दवा किसी व्यक्ति पर कितना असर करेगी, यह उसके वंश पर भी कुछ हद तक निर्भर कर सकता है। इसे आनुवंशिक विविधता (Genetic Variation) कहा जाता है।

भारत में कई तरह के समुदाय और जातियाँ पाई जाती हैं। छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में कुछ जनजातीय समुदाय आज भी पारंपरिक दवाओं पर अधिक विश्वास करते हैं और आधुनिक (अंग्रेजी) दवाओं का उपयोग कम करते हैं।

ऐसे मामलों में कुछ लोगों का अनुभव यह कहता है कि जिन लोगों ने पहले कभी आधुनिक दवाओं का उपयोग नहीं किया होता, उन पर दवा का असर जल्दी दिखाई दे सकता है। वहीं, जो लोग नियमित रूप से दवाओं का उपयोग करते हैं, उनमें कभी-कभी असर धीमा महसूस हो सकता है।
Why don't all medicines affect everyone the same way?


हालांकि, यह एक सामान्य अनुभव है और इसे पूरी तरह वैज्ञानिक सत्य मानने के लिए और अधिक शोध की आवश्यकता होती है।

उदाहरण के लिए, छत्तीसगढ़ की बैगा और धनुहार जैसी जनजातियाँ पारंपरिक चिकित्सा पद्धति पर अधिक निर्भर रहती हैं। कई बार ये लोग आधुनिक दवाओं का उपयोग बहुत कम करते हैं और अपनी पारंपरिक दवाओं से ही इलाज करते हैं। लेकिन यह कहना कि वे हमेशा जल्दी ठीक हो जाते हैं, वैज्ञानिक रूप से पूरी तरह प्रमाणित नहीं है।

 प्रतिभागियों में विविधता का महत्व क्या है 


हाल ही में एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में कार्यरत एक डॉक्टर ने बताया कि पहले टाइफाइड के मरीजों को 1 ग्राम दवा देने से ही आराम मिल जाता था, लेकिन अब कुछ मामलों में 1.2 या 1.5 ग्राम तक दवा देनी पड़ती है, तब जाकर असर दिखाई देता है।

वहीं दूसरी ओर, जो लोग पहली बार दवा लेते हैं, उनमें कभी-कभी दवा का असर जल्दी देखने को मिलता है। इसका कारण यह हो सकता है कि उनके शरीर ने पहले उस दवा के साथ कोई अनुकूलन (adaptation) नहीं किया होता।

फार्माकोलॉजी (दवाओं का विज्ञान) को जीनोमिक्स के साथ जोड़ने की क्षमता एक महत्वपूर्ण साधन बनती जा रही है। इससे ऐसी दवाएँ विकसित करने में मदद मिलती है, जो किसी व्यक्ति की आनुवंशिक संरचना के आधार पर अधिक प्रभावी और सुरक्षित हों।

जानिए कौन-सी दवा सबसे बेहतर काम करती है?


डॉ. शाह इस बात की जांच कर रही हैं कि यह बेहतर तरीके से कैसे पता लगाया जाए कि कौन-सी एंटीडिप्रेसेंट दवा किस मरीज पर सबसे अच्छा काम करेगी।

उनके अनुसार,
“हम अभी पूरी तरह से नहीं समझ पाए हैं कि अलग-अलग एंटीडिप्रेसेंट दवाएँ कैसे काम करती हैं, और हम अभी भी यह सीख रहे हैं कि शरीर में कौन-से जैविक परिवर्तन डिप्रेशन का कारण बनते हैं। इसका मतलब है कि फिलहाल यह पहचानने का एकमात्र तरीका कि कौन-सा उपचार सबसे अच्छा काम करेगा, ‘ट्रायल एंड एरर’ ही है।”

इसका मतलब यह है कि कई बार मरीजों को सही दवा मिलने से पहले कई अलग-अलग दवाओं को आज़माना पड़ता है।

“कुछ लोगों को वह दवा खोजने से पहले तीन या चार प्रकार की एंटीडिप्रेसेंट दवाएँ आज़मानी पड़ सकती हैं, जो उनके लिए सही काम करे, और इस पूरी प्रक्रिया में कई महीने लग सकते हैं।”

इसलिए सही एंटीडिप्रेसेंट दवा ढूंढना कई बार एक चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया बन जाता है।

 आगे क्या है ट्रायल एंड एरर की : भविष्यवाणी (Prediction)


अब वैज्ञानिक इस प्रक्रिया को तेज और सटीक बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

डॉ. शाह बताती हैं,
“हम लैब में मरीजों की कोशिकाएँ विकसित कर रहे हैं, ताकि यह अनुमान लगाया जा सके कि वे किस दवा पर सबसे अधिक प्रतिक्रिया देंगे।”

उनके अनुसार,
“यदि हम लैब में इन कोशिकाओं को किसी एंटीडिप्रेसेंट दवा के संपर्क में लाते हैं, तो यह देखा जा सकता है कि वे कोशिकाएँ कैसे प्रतिक्रिया देती हैं। यह इस बात पर निर्भर करता है कि वे कोशिकाएँ ऐसे व्यक्ति से आई हैं जो दवा पर प्रतिक्रिया देता है या ऐसे व्यक्ति से जो प्रतिक्रिया नहीं देता।”

इस प्रक्रिया में कुछ जीन सक्रिय (ON) हो जाते हैं और कुछ निष्क्रिय (OFF) हो जाते हैं।

“ये अंतर जीन एक्सप्रेशन (Gene Expression) का एक खास ‘सिग्नेचर’ बनाते हैं, जो रिस्पॉन्ड करने वाले और न करने वाले लोगों में अलग होता है।”

इसी आधार पर भविष्य में एक साधारण ब्लड टेस्ट विकसित किया जा सकता है, जो यह पहले से बता सके कि कौन-सी दवा किसी व्यक्ति के लिए सबसे उपयुक्त होगी।

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⚠️ महत्वपूर्ण सूचना


यह जानकारी केवल शैक्षिक उद्देश्य के लिए है। किसी भी दवा का उपयोग डॉक्टर की सलाह के बिना न करें।

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